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सोयाबीन के कीटों की सही पहचान और सही मात्रा में दवा का इस्तेमाल जरूरी

सोयाबीन पर इल्लियों के प्रकोप के बीच केविके के वैज्ञानिक आशीष बोवड़े से अक्षरविश्व की विशेष चर्चा

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सुमित कुमार उज्जैन। खरीफ सीजन की प्रमुख फसल सोयाबीन मालवांचल के खेतों में लहलहा रही है, मगर बारिश की लंबी खेंच के बीच कई जगह से फसल पर इल्लियों के प्रकोप की जानकारी आ रही है। ऐसी स्थिति में कीट नियंत्रण और फसल की देखरेख को लेकर अक्षरविश्व ने कृषि विज्ञान केंद्र (केविके) के वैज्ञानिक आशीष बोवड़े से अक्षरविश्व ने चर्चा की। पेश है उनसे बातचीत के संपादित अंश।

सवाल – वर्तमान में कौन-कौन से कीट सक्रिय है ?
जवाब – सोयाबीन में अर्धकुंडलक इल्ली यानी सेमीलूपर, तंबाकू की इल्ली हेलियोथिस या चने की इल्ली दिखाई दे रही हैं। इन्हें अमेरिकन इल्ली के नाम से भी पहचानते हैं। आने वाले समय में कुछ क्षेत्रों में गर्डल बीटल यानी चक्रभृंग और तना मक्खी का प्रकोप भी सामने आ सकता है।

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सवाल – क्या कम मात्रा में दवा डालना भारी पड़ सकता है?
जवाब- कीट प्रबंधन के लिए खेत की नियमित निगरानी और कीट की सही पहचान जरूरी है। किसान को कीटनाशक की प्रति हेक्टेयर अनुशंसित मात्रा का पूरा उपयोग करना चाहिए। यदि 500 लीटर पानी एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए निर्धारित है तो उसमें दवा की अनुशंसित मात्रा डालकर उसी क्षेत्र में छिडक़ाव किया जाना चाहिए। एक टंकी की दवा को 6 से 8 बीघा तक फैलाने से दवा की मात्रा कम पड़ सकती है और कीटों पर अपेक्षित असर नहीं होगा। लगातार कम मात्रा में दवा के इस्तेमाल से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने की आशंका भी रहती है। फेरोमोन ट्रैप सहित नियमित निगरानी को भी समेकित कीट प्रबंधन का हिस्सा बनाया जा सकता है।

सवाल – किसानों के लिए क्या जैविक विकल्प उपलब्ध है ?
जवाब – इल्ली नियंत्रण के लिए किसान जैविक विकल्पों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इनमें नीम तेल, बीटी यानी बैसिलस थुरिनजिएंसिस और एनपीवी शामिल हैं। 300 पीपीएम नीम तेल करीब 5 मिलीलीटर प्रति लीटर तथा 10,000 पीपीएम नीम तेल करीब 1 से 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से उपयोग किया जा सकता है। बीटी पत्ती खाने वाली इल्लियों के नियंत्रण में उपयोगी है। हेलियोथिस के लिए एचएनपीवी और तंबाकू की इल्ली के लिए एसएनपीवी का उपयोग किया जा सकता है।

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सवाल – कीटनाशक छिडक़ाव में किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?
जवाब – कीटनाशक के प्रभावी छिडक़ाव के लिए पर्याप्त पानी जरूरी है। प्रति हेक्टेयर करीब 500 से 600 लीटर पानी होना चाहिए, ताकि दवा का पौधों पर पर्याप्त असर हो। किसानों को दवा की मात्रा कम या अधिक करने के बजाय लेबल पर दी गई अनुशंसा का पालन करना चाहिए। निर्धारित क्षेत्र से अधिक क्षेत्र में एक टंकी की दवा फैलाने से अंडरडोज की स्थिति बन सकती है, जिससे कीट नियंत्रण प्रभावित होगा।

यह भी सलाह दी

 एक ही समूह के कीटनाशक का बार-बार इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।

 सोयाबीन में अनुशंसित और लेबल-क्लेम वाले कीटनाशकों का ही उपयोग करने की सलाह है।

 सही कीट की पहचान, नियमित निगरानी और सही मात्रा में समय पर किया गया उपचार ही फसल को कीटों से बचाने का प्रभावी तरीका है।

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