पितृपक्ष की चतुर्दशी कल, सिद्धवट पर होगा दुग्धाभिषेक

अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। पितृपक्ष की चतुर्दशी शुक्रवार को रहेगी। सिद्धवट पर दुग्धाभिषेक होगा। अश्विन कृष्ण चतुर्दशी पर दुग्धाभिषेक की शुरुआत तड़के 4 बजे से होगी। सिद्धवट मंदिर के पुजारी सुधीर चतुर्वेदी, सुरेंद्र चतुर्वेदी ,जितेंद्र पुजारी,ओमप्रकाश चतुर्वेदी, शिवम पुजारी, दिनेश पुजारी ,राघवेंद्र चतुर्वेदी ,राजेश चतुर्वेदी, कृष्णकांत पुजारी, बालकृष्ण पुजारी, पंडित अनय चतुर्वेदी, विशु चतुर्वेदी, उपेंद्र पुजारी संजय पुजारी और तीर्थ पुरोहित श्रद्धालुओं के पूर्वजों की आत्म शांति के निमित्त भगवान सिद्धवट का दुग्धाभिषेक करेंगे। सुरेंद्र चतुर्वेदी ने बताया कि श्राद्ध चतुर्दशी (9 अक्टूबर) एवं सर्वपितृ अमावस्या(१० अक्टूबर) पर श्राद्ध तर्पण होगा। इस दिन श्रद्धालु उन पितरों के लिए दुग्धाभिषेक और तर्पण कर सकते हैं, जिनकी तिथि ज्ञात है और जिनकी ज्ञात नहीं है।
शास्त्रों में 16 श्राद्ध, प्रचलन में केवल 12 ही
उज्जैन। सनातन धर्म में पितरों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने के लिए 96 तरह के श्राद्ध है, लेकिन मोटे तौर पर 12 ज्यादा प्रचलन में हैं। इन्हीं में से एक है शुद्धयर्थ श्राद्ध। यह श्राद्ध स्वयं की शुद्धि, जाने अनजाने में हुए दोषों के निवारण और शांति के लिए किया जाता है। उज्जैन के बारे मे शास्त्रों में कहा गया है कि जले मुक्ति – थले मुक्ति।
पितृपक्ष की चतुर्दशी का श्राद्ध विशेष होता है। इस दिन उन पितरों का स्मरण और श्राद्ध किया जाता है, जिनका देहांत असामान्य परिस्थितियों, दुर्घटना, शस्त्राघात या युद्ध में हुआ हो। यही कारण है कि इसे घात चतुर्दशी भी कहते हैं। इसे चौदस का श्राद्ध, घट चतुर्दशी, घायल चतुर्दशी भी कहा जाता है। पितृपक्ष के 14 वें दिन होने वाले इस श्राद्ध से पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। यह श्राद्ध उन लोगों के लिए भी किया जाता है,जिनकी अकाल मौत (आग में जलने, हादसा, डूबने, जहर खाने, सांप काटने) हुई हो। नि:संतान का श्राद्ध: जिन पितरों की मृत्यु नि:संतान हुई हो, उनका श्राद्ध भी चतुर्दशी पर किया जाता है।
साधना और तंत्र-मंत्र: यह तिथि सामान्य कार्यों के लिए शुभ नहीं मानी जाती। आध्यात्मिक साधना, तंत्र-मंत्र की सिद्धि और आंतरिक ऊर्जा के जागरण के लिए यह तिथि शक्तिशाली होती है। चतुर्दशी को रिक्ता तिथि भी माना जाता है। इस दिन नए व्यापार की शुरुआत करने, गृह प्रवेश, विवाह, मांगलिक कार्य करने की मनाही रहती है।









