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Bandar Movie Review: अनुराग कश्यप के कानूनी ड्रामे में छाए बॉबी देओल, करियर की दमदार परफॉर्मेंस से जीता दिल

सिनेमा की दुनिया में अनुराग कश्यप कभी भी आसान और सीधे रास्ते चुनने वाले फिल्ममेकर नहीं रहे। उनकी फिल्में दर्शकों को हमेशा एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती हैं जहां सही और गलत के बीच का फर्क धुंधला हो जाता है। उनकी नई फिल्म ‘बंदर’ भी इसी कड़वी हकीकत और बेचैनी की परंपरा को आगे बढ़ाती है। सच्ची घटनाओं से प्रेरित यह फिल्म दिखाती है कि कैसे एक हंसती-खेलती जिंदगी महज एक आपराधिक आरोप के बाद ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है। यह फिल्म किसी को दोषी या निर्दोष ठहराने का काम नहीं करती बल्कि एक असंवेदनशील सिस्टम में फंसे इंसान के मानसिक और भावनात्मक टूटने की कहानी है। धीमी रफ्तार के बावजूद बॉबी देओल की संजीदा एक्टिंग इसे दर्शकों के दिलो-दिमाग पर गहरा असर छोड़ने वाली फिल्म बनाती है।

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कहानी — हेडलाइंस के फीके पड़ने के बाद का कड़वा सच

फिल्म की कहानी समीर मेहरा नाम के एक नामचीन टीवी पर्सनैलिटी के इर्द-गिर्द घूमती है जिसका किरदार बॉबी देओल ने निभाया है। समीर का करियर पहले से ही थोड़ा डगमगा रहा होता है और तभी उन पर बलात्कार का एक संगीन आरोप लग जाता है। इसके बाद शुरू होता है अंतहीन कानूनी कार्यवाहियों, मीडिया ट्रायल और सामाजिक बहिष्कार का वह दर्दनाक सफर जो समीर को पूरी तरह तोड़कर रख देता है। रातोंरात वह एक ऐसे विलेन में तब्दील हो जाते हैं जिसके बारे में तथ्यों की जांच किए बिना ही समाज अपना फैसला सुना देता है। अनुराग कश्यप ने इसे पारंपरिक कोर्टरूम थ्रिलर बनाने के बजाय इस बात पर फोकस किया है कि जब ब्रेकिंग न्यूज और हेडलाइंस फीकी पड़ जाती हैं तब क्या होता है। जेल की कालकोठरी का मानसिक असर, बिखरते रिश्ते और घुट-घुटकर दम तोड़ती उम्मीद ही इस कहानी की असली आत्मा है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कोई साफ-सुथरा हीरो या विलेन नहीं बल्कि हर किरदार ग्रे-शेड्स लिए हुए है।

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लेखन और निर्देशन — संयम और समझदारी की मिसाल

कश्यप ने इस कहानी को बेहद संयम के साथ पेश किया है। कोई बड़े-बड़े भाषण नहीं और न ही सिर्फ गुस्सा दिलाने के लिए बनाए गए नाटकीय दृश्य। डायरेक्टर ने फिल्म की परिस्थितियों को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने दिया है और दर्शकों पर भरोसा किया है कि वे चीजें खुद समझें। फिल्म के सबसे इमोशनल पल बेहद शांत हैं — जेल में बातचीत, अकेलेपन का एहसास और बेबसी भरी नजर। ये छोटे-छोटे पल लंबे-चौड़े डायलॉग्स से कहीं ज्यादा असरदार साबित होते हैं। हालांकि स्क्रिप्ट तब लड़खड़ाती है जब वह एक साथ जेल ड्रामा, लीगल थ्रिलर, मीडिया कमेंट्री और किरदारों की गहरी पड़ताल सब कुछ एक साथ संभालने की कोशिश करती है। फिर भी कश्यप को एक संवेदनशील विषय को समझदारी से संभालने का पूरा श्रेय मिलना चाहिए।

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तकनीकी पहलू — जमीन से जुड़ी और असली लगती है फिल्म

तकनीकी रूप से बंदर अपने गंभीर माहौल के साथ अच्छी तरह मेल खाती है। सिनेमैटोग्राफी में असलियत दिखाने की पूरी कोशिश की गई है और दिखावे के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई। जेल के दृश्य असली लगते हैं जो सीधे असर करते हैं। प्रोडक्शन डिजाइन भी काफी मददगार है। जेल की कोठरियां हों, पूछताछ के कमरे हों या कोर्टरूम — सब कुछ इस्तेमाल किया हुआ और वास्तविक लगता है। बैकग्राउंड म्यूजिक बेहद कम है लेकिन समझदारी से उपयोग किया गया है और यह दर्शकों को यह बताने के बजाय कि क्या महसूस करना है इमोशनल भार एक्टर्स पर छोड़ देता है। एडिटिंग ज्यादातर ठीक है लेकिन फिल्म की लंबाई कभी-कभी कहानी की रफ्तार धीमी कर देती है।

फिल्म की कमियां — परफेक्ट नहीं है बंदर

बंदर की अपनी खूबियां हैं लेकिन यह परफेक्ट नहीं है। इसकी रफ्तार सबसे बड़ी समस्या है। कानूनी कहानी और समीर का इमोशनल सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और कई दृश्य दोहराव वाले लगते हैं। फिल्म का दूसरा हिस्सा खासतौर पर बहुत लंबा महसूस होता है। कुछ सपोर्टिंग किरदारों को भी ठीक से डेवलप नहीं किया गया जो बड़े रोल का संकेत तो देते हैं लेकिन वैसा होता नहीं। फिल्म का अंत भी विभाजनकारी है। इतने लंबे सफर के बाद क्लाइमेक्स काफी जल्दी खत्म हो जाता है जिससे यह एहसास रहता है कि कहानी में अभी और कुछ बताया जा सकता था। इन कमियों से फिल्म बिगड़ती तो नहीं लेकिन ये इसे सच में बेहतरीन बनने से जरूर रोक देती हैं।

एक्टिंग — बॉबी देओल का करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन

अगर बंदर देखने की एक सबसे बड़ी वजह है तो वह हैं बॉबी देओल। आश्रम और एनिमल के बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह री-इन्वेंट किया था लेकिन इस फिल्म में उन्होंने जो लाचारी, भावुकता और मानसिक थकान दिखाई है उसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की होगी। उनका अभिनय चीखने-चिल्लाने के बजाय खामोशी और आंखों के हाव-भाव पर टिका है। समीर के डर को उन्होंने इतनी शिद्दत से जिया है कि दर्शकों को उनसे सच में हमदर्दी होने लगती है। यह बॉबी देओल के पूरे करियर की सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस कही जा सकती है। बाकी सहयोगी कलाकारों ने भी कहानी की वास्तविकता बनाए रखने में शानदार योगदान दिया है।

फाइनल वर्डिक्ट — असहज करेगी पर सोचने पर मजबूर भी करेगी

बंदर कोई पॉपकॉर्न एंटरटेनर नहीं है। इसे देखना कई जगह असहज करने वाला और सब्र की परीक्षा लेने वाला अनुभव हो सकता है। लेकिन आज के सोशल मीडिया के दौर में जहां बिना सच जाने लोग कुछ ही मिनटों में किसी को भी मुजरिम बना देते हैं वहां यह फिल्म बेहद जरूरी और समयोचित सवाल उठाती है। बॉबी देओल की लाजवाब एक्टिंग और अनुराग कश्यप का संयमित निर्देशन इसे एक बार जरूर देखने लायक बनाते हैं।

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