मैं 100 साल पुराना उज्जैन का जिला अस्पताल भवन हूं, अब मेडिसिटी के तौर पर होगा मेरा विकास

शतायु में तरक्की और कई हादसों का गवाह रहा हूं…एक बार फिर लौटूंगा

अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन कैलाश शर्मा । मैं उज्जैन का जिला अस्पताल भवन। संभाग के सबसे बड़े सिविल हॉस्पिटल का दर्जा मेरे पास है। अब में प्रदेश की मेडिसिटी के तौर पर विकसित होने जा रहा हूं। मैं सुख-दु:ख,लाभ-हानि,यश-अपयश,जीवन-मरण का गवाह रहा। आने वाले समय में नए चिकित्सक,शोध और आयाम को स्थापित करने का माध्यम बनने जा रहा हूं।
आज से लगभग 100 साल पहले मेरा जन्म हुआ था। मुझे लोग अलग-अलग नाम से जानते हैं। कोई मुझे सिविल अस्पताल, कहता है तो कोई बड़ा अस्पताल। 1923 में माताओं और बच्चों की केयर करने करने के मकसद से सेठ जुगलकिशोर अनंतनारायणदास जव्हेरी ने प्रसूतिगृह की इमारत बनवाने की शुरुआत की और 1927 को यह भवन बनकर तैयार हुआ। इस तरह मेरा जन्म हुआ। श्रीमंत महाराजा माधवराव सिंधिया ने 7 जुलाई 1927 को भवन का शुभारंभ किया और मेरी कमान संभाली पहले सिविल सर्जन डॉ. रामदयाल पाठक ने। तब से लेकर अब तक 50 से अधिक सिविल सर्जन मेरी देखभाल कर चुके हैं।
1933 तक मैं इसी भवन में चलता रहा और इसके बाद मेरे विस्तार और फैलाव की शुरुआत हुई। संख्याराजे प्रसूतिगृह के दूसरी तरफ बने भवन में मुझे शिफ्ट कर दिया गया और मुझे जिला अस्पताल के नाम से जाना जाने लगा। सिंधिया स्टेट की इस इमारत में ओपीडी के साथ वार्डों की शुरुआत हुई और लोग भर्ती होकर उपचार कराने लगे। अच्छे उपचार और डॉक्टरों की मेेहनत के कारण जल्दी ही मेरी पहचान उज्जैन संभाग के बड़े अस्पताल के तौर पर होने लगी और शाजापुर, आगर-मालवा, मंदसौर, देवास, नीमच, रतलाम और सारंगपुर तक से लोग उपचार के लिए मेरे पास आने लगे। टिटनेस के गंभीर मर्ज में तब्दील होने पर 1980 मेंं टिटनेस मरीजों के लिए आइसोलेशन वार्ड बनाया गया। किसी समय मेरे सामने से गुजरने वाली सडक़ के समानांतर नैरोगेज ट्रेन भी गुजरती थी, जिसमें बैठकर दूर-दूर से मरीज उपचार के लिए आते थे।
मेरी तरक्की की कहानी
1992 से मेरी तरक्की को पंख लगे। नया शिशु वार्ड बना, सेठी बिल्डिंग े दो मंजिला कर दी गईा। डॉक्टरों के निवास, प्रसूतिगृह के पीछे नया निर्माण भी हुआ। मेरे लिए सबसे बड़ा बदलाव 2०१६ का सिंहस्थ लेकर आया। जब टीबी वार्ड वाली जगह पर चरक भवन का निर्माण शुरू हुआ। छह मंजिला इस भवन में आज आधुनिक उपचार की सारी सुविधाएं मौजूद हैं।
मंदिर हादसे के समय सिसक उठा था
100 साल में मैंने कई हादसे और दुर्घटनाएं देखीं। लेकिन सबसे ज्यादा दर्द मुझे महाकाल हादसे के समय हुआ। जब मेरा आंगन लाशों से पट गया था। श्री महाकालेश्वर के दर्शन के लिए आए श्रद्धालु भगदड़ का शिकार हुए थे और उनकी दर्दनाक मौत से मैं भी सिसक उठा था। कवेलू की छत वाले पोस्टमार्टम रूम के बाहर लाशें रखीं थीं और डॉक्टर उनका पीएम कर रहे थे। बाहर मृतकों के परिजन बिलख रहे थे। 2010 में मुझे पक्का और सर्वसुविधा युक्त पोस्टमार्टम रूम मिलाा।
बिना देरी किए तोडऩे का काम
मेडिकल कॉलेज (मेडिसिटी) के लिए जिला अस्पताल को एक माह का में शिफ्टिंग में करना था, लेकिन भोपाल से निर्देश के बाद महज 36 घंटे में ही संभाग के सबसे बड़े जिला अस्पताल को चरक चिकित्सालय में शिफ्ट कर दिया गया। बिना देरी किए जिला अस्पताल की पुरानी बिल्डिंग को तोडऩे का भी काम शुरू हो गया।
सोमवार को इसकी शुरूआत पुराने सख्याराजे प्रसूतिगृह, कैंसर यूनिट से हुई। ठेकेदार को जिला अस्पताल के सभी पुराने भवनों को उसे तोडक़र जमीन को समतल करने का काम भी एक माह में करना है। भवनों को तोडऩे का ठेका 1 करोड़ 81 लाख रु.में दिया गया है। इनमें 18 प्रतिशत जीएसटी भी शामिल है। सीएमएचओ डॉ. अशोक कुमार पटेल ने बताया मरीज भी अब इलाज के लिए जिला अस्पताल की बजाए चरक अस्पताल ही जाए, क्योंकि अब मुख्य अस्पताल चरक हो चुका है।
दो साल बाद मैं फिर लौटूंगा
मेडिकल कॉलेज की इमारत बनाने के लिए मुझे तोड़ा जा रहा है। मेरे आंगन में माताओं ने देश और शहर का नाम रोशन करने वाले शिशुओं को जन्म दिया है। मुझे इसका अभिमान है। मैं दो साल बाद एक बार फिर लौटूंगा नए भवन के साथ। तब मैं फिर से एक नया इतिहास लिखूंगा।









