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धर्म परिवर्तन के बाद पुराने वर्ग के आधार पर आरक्षण नहीं मिलेगा : सुप्रीम कोर्ट

इस्लाम अपनाने के बाद पूर्व जाति के आधार पर पिछड़ा वर्ग का लाभ नहीं ले सकते, मद्रास हाई कोर्ट का फैसला बरकरार

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नईदिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल अपनी पूर्व जाति या सामाजिक पहचान के आधार पर पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी में आरक्षण का लाभ नहीं मांग सकता। अदालत ने कहा कि किसी विशेष सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा पिछड़ापन धर्म परिवर्तन के बाद अपने आप नई धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था में स्थानांतरित नहीं हो जाता।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण या अन्य वैधानिक लाभ के लिए संबंधित वर्ग की निर्धारित पात्रता शर्तें पूरी करना जरूरी है।

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मुस्लिम लेब्बई समुदाय का प्रमाणपत्र मांगा था

यह मामला समीर अहमद की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था। वर्ष 2016 में उनके धर्म परिवर्तन को राजपत्र में अधिसूचित किया गया। इसके बाद उन्होंने इस्लामी रीति-रिवाजों से विवाह किया और आरक्षण का लाभ लेने के लिए मुस्लिम लेब्बई समुदाय का प्रमाणपत्र मांगा।

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तमिलनाडु सरकार ने दलील दी थी कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों के पात्र धर्मांतरित व्यक्तियों को प्रमाणपत्र जारी किया जा सकता है। हालांकि, मद्रास हाई कोर्ट ने 9 मार्च 2024 के राज्य सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसके तहत पात्र धर्मांतरित व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) समुदाय का प्रमाणपत्र देने का प्रावधान किया गया था।

महाराष्ट्र में पटाखे पूरे साल बैन, बनाने-बेचने पर रोक नहीं, दिवाली-क्रिसमस में नहीं फोड़ सकेंगे
मुंबई, एजेंसी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को सार्वजनिक सड़कों, गलियों और फुटपाथों पर पटाखे फोडऩे पर लगी रोक पूरे साल लागू कर दी। यह रोक नवरात्रि, दिवाली, क्रिसमस और अन्य सभी त्योहारों पर लागू होगी। आदेश पूरे महाराष्ट्र में त्योहारों के जुलूसों के दौरान शोर और वायु प्रदूषण रोकने के लिए दिया गया है। जस्टिस गिरीश एस. कुलकर्णी और जस्टिस नीला के. गोकले की खंडपीठ ने यह निर्देश दिया। बेंच ने कहा जब तक नागरिक हालात की जरूरत को नहीं समझेंगे और शहरों में रहने के लंबे समय के खतरों के प्रति जागरूक नहीं होंगे, तब तक हालात बिगड़ते रहेंगे।

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