पर्युषण पर्व विशेष : जिन शासन के सेवक आत्मकल्याण का मार्ग इस दौरान सुनिश्चित करें

पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के दौरान जिनशासन के सभी सेवक परमात्मा की भक्ति में लीन रहकर आत्म कल्याण का मार्ग सुनिश्चित करें। जो दुनिया को जीत ले वह वीर और जो स्वयं को जीत ले वह महावीर होता है। जैन धर्म का कर्म सिद्धांत भी इसी आधार पर है कि हम स्वयं को भीतर से जानें और आत्मा के कल्याण एवं मोक्ष की प्राप्ति के लिए तीर्थंकरों के बताए उपदेश व सिद्धांतों का पालन करें। क्योंकि जो व्यक्ति खुद को नहीं जीत सकता या स्वयं पर नियंत्रण नहीं कर सकता, वह आत्म कल्याण से नहीं जुड़ सकता।
हिंसा, झूठ, चोरी, सांसारिक चीजों से दूर रहना और ब्रह्मचर्य ये पांच महाव्रत हैं। ऐसे भिक्षु या साधु, जो जैन धर्म के पांच महाव्रतों का पालन करते हों उनको ‘जिन’ कहा गया। जैन धर्म के तीर्थंकरों ने अपने मन, अपनी वाणी और काया को जीत लिया था। ‘जिन’ के अनुयायियों को जैन कहा गया है।
पुराने समय में तप और मेहनत से ज्ञान प्राप्त करने वालों को श्रमण कहा जाता था। जैन धर्म प्राचीन भारतीय श्रमण परम्परा से ही निकला धर्म है। इसलिए भगवान महावीर को श्रमण भगवान महावीर कहा जाता है।
जैन धर्म अनुयायियों को सिखाता है कि वे सत्य पर टिकें, प्रेम करें, हिंसा से दूर रहें, दया-करूणा का भाव रखें, परोपकारी बनें। साथ ही भोग-विलास से दूर रहकर हर काम को पवित्र और सात्विक रूप से करें। जिन आराधना में लीन होकर कर्मो की निर्जरा एवं आत्म कल्याण के लिए मन की इच्छाओं पर नियंत्रण रखें।
साध्वी चारुधर्मा श्रीजी चातुर्मास- श्री शंखेश्वर पाश्र्वनाथ चौमुखा जिनालय, सुभाष नगर उज्जैन









