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Rajni Ki Baraat Review: इमोशन, कॉमेडी और प्यार से भरपूर दिल छू लेने वाली कहानी

इस शुक्रवार एक ऐसी फिल्म सिनेमाघरों में दस्तक दे रही है जो न सिर्फ दिल को छूएगी बल्कि पुरानी सोच को भी एक जोरदार झटका देगी। बिहार के दरभंगा की जीवंत और रंगीन पृष्ठभूमि में बुनी गई यह कहानी एक ऐसी लड़की की है जो प्यार पाने के लिए खुद बारात लेकर निकल पड़ती है। यह फिल्म पारिवारिक मनोरंजन और महिला साहस का एक अनोखा और देसी संगम है।

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कहानी जो शुरू होते ही दिल को हिला देती है

फिल्म की शुरुआत दरभंगा की धुंधली सुबह से होती है जहां मुख्य पात्र रजनी अपने गुजर चुके पिता के पुराने जंग खाए स्कूटर के पास खड़ी है। उसकी आंखों में अनगिनत अनुत्तरित सवाल हैं और वह बार-बार एक ही बात दोहराती है कि राम जाने। यह पहला दृश्य ही रजनी की भावनात्मक गहराई को बखूबी उजागर कर देता है। रजनी एक बेबाक और बिंदास लड़की है जो दरभंगा की गलियों और चाय की दुकानों के बीच पली-बढ़ी है। घर में उसकी मां हैं जिनकी सुबह रजनी को डांटने से शुरू होती है और दादी हैं जो उसकी सबसे बड़ी ताकत और सहारा हैं।

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कहानी में प्रेम की दस्तक तब होती है जब रजनी को शहर के एक शर्मीले और संवेदनशील कवि युवक से प्यार हो जाता है। वह युवक जितना अच्छा कवि है उतना ही असल जिंदगी में डरपोक है क्योंकि उसके पिता शहर के सबसे कड़क और प्यार के धुर विरोधी पुलिस इंस्पेक्टर हैं। उनका एकमात्र नियम है कि जब तक वे इस शहर में हैं यहां प्रेम के रिश्ते नहीं चलेंगे।

अपना दबदबा बनाए रखने के लिए इंस्पेक्टर अपने बेटे की शादी एक धनी परिवार की लड़की से तय कर देते हैं। लेकिन असली मोड़ तब आता है जब इंस्पेक्टर खुद दोनों को एक बगीचे में रंगे हाथों पकड़ लेते हैं। जहां वह युवक डर के मारे घुटनों पर गिर जाता है वहीं रजनी बिना एक पल डरे इंस्पेक्टर की आंखों में आंखें डालकर अपने प्यार का इजहार कर देती है। जब सारी कोशिशें नाकाम होती हैं तो रजनी एक ऐसा फैसला लेती है जो पूरे शहर को हिला देता है। वह ऐलान करती है कि वह खुद बारात लेकर उस घर पहुंचेगी। इसी ऐलान के बाद शहर के दोस्तों, पड़ोसियों और स्थानीय युट्यूबर्स के साथ एक ऐसी मजेदार और भावुक यात्रा शुरू होती है जो क्लाइमैक्स तक दर्शकों को सांस नहीं लेने देती।

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निर्देशन जो बिहार को नई नजर से देखता है

निर्देशक ने यह साबित कर दिया है कि वे छोटे शहरों की आत्मा को बखूबी समझते हैं। अक्सर बॉलीवुड फिल्मों में बिहार को बंदूक, गरीबी और जातिवाद के चश्मे से दिखाया जाता है लेकिन इस फिल्म ने उस घिसी-पिटी सोच को पूरी तरह तोड़ा है। यहां बिहार खूबसूरत, रंगीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नजर आता है। महिला सशक्तिकरण का संदेश किसी भारी-भरकम भाषण की तरह नहीं थोपा गया बल्कि हल्के-फुल्के और भावुक दृश्यों के जरिए दर्शकों के दिलों तक पहुंचाया गया है।

अभिनय जो फिल्म को अमर बना देता है

यह फिल्म पूरी तरह उल्का गुप्ता के कंधों पर टिकी है और उन्होंने इस जिम्मेदारी को बेहद शिद्दत से निभाया है। रजनी के किरदार में उनका बिहारी लहजा बिल्कुल स्वाभाविक और नैसर्गिक है, जरा भी बनावटी नहीं लगता। भावुक दृश्यों में उनकी आंखों से बहते आंसू दर्शकों को भी उनके दर्द में शामिल कर लेते हैं। यह निस्संदेह उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ भूमिका है।

मुख्य खलनायक की भूमिका में अश्वथ भट्ट ने जानदार काम किया है। उनकी दमदार आवाज, मूंछों पर ताव और पुलिस वाले जैसा रौबदार अंदाज फिल्म को एक अलग ही ऊंचाई पर ले जाता है। उल्का गुप्ता और अश्वथ भट्ट के आमने-सामने के संवाद दृश्य फिल्म की असली जान हैं।

मां के किरदार में सुनीता राजवार की हास्य टाइमिंग लाजवाब है। दादी की भूमिका में जरीना वहाब ने फिल्म में ममता और अपनापन भर दिया है। प्रेमी की भूमिका में कनिष्क विजय की मासूमियत दर्शकों का दिल जीत लेती है।

xसिनेमाई सौंदर्य और संगीत

फिल्म की छायांकन कला बेहद प्रभावशाली है। कैमरे ने दरभंगा की असली गलियों, पुराने घरों की नक्काशी, तालाब के किनारों और बाजारों की तंग गलियों को बड़ी खूबसूरती से कैद किया है। भावुक और रोमांटिक दृश्यों में रोशनी का उपयोग दिल को छू लेने वाला है।

फिल्म का संगीत कहानी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता है। लोक संगीत का समझदारी भरा उपयोग फिल्म को एक देसी आत्मा देता है। जब रजनी बारात लेकर निकलती है तब पृष्ठभूमि में बजते ढोल और लोक धुनों का संगम रोंगटे खड़े कर देता है।

कुछ कमियां भी हैं

अंतराल के बाद फिल्म की गति कुछ धीमी पड़ जाती है और कहानी थोड़ी भटकती हुई लगती है। प्रेमी के किरदार को रजनी के मुकाबले काफी कमजोर दिखाया गया है, कुछ दृश्यों में उन्हें थोड़ा और मजबूत दिखाया जाता तो दोनों के बीच की रसायन और प्रभावशाली होती।

अंतिम राय

रजनी की बारात केवल एक प्रेम कहानी नहीं है। यह बदलते भारत के छोटे शहरों की उन बेटियों की दास्तान है जो अब अपने हक, अपने प्यार और अपने फैसलों के लिए समाज की पुरानी दीवारों को चुनौती देने का साहस रखती हैं। यह फिल्म उन दोहरे मानदंडों पर भी तीखा और मीठा प्रहार करती है जो यह मानते हैं कि प्यार का पहला कदम हमेशा लड़के को ही उठाना चाहिए। शानदार अभिनय, उम्दा निर्देशन और हंसी तथा आंसुओं के इस खूबसूरत मेल को इस वीकेंड पूरे परिवार के साथ सिनेमाघर में जरूर देखें।

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