खरी-खरी : मुख्यमंत्री की ढाल बनें , दीवार नहीं

विनोदसिंह सोमवंशी। ली डर अपनी सेकेंड लाइन इसलिए मजबूत करता है कि उसकी मुश्किलें कम हों, रास्ते आसान हों, फैसले जमीन पर उतारने में मदद मिले और लोग उनसे जुड़ें और यही सेकेंड लाइन अगर लीडर का काम आसान करने के बजाय रायता फैलाने लगे और इस रायते को लीडर को समेटना पड़े तो उलझन वाली स्थिति बनती है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के रोड शो के दौरान महापौर मुकेश टटवाल को रथ से उतारे जाने का मसला रायता फैलाने का ही उदाहरण है। यह मुद्दा जिस तरह उछला, उसने सीएम को कठिनाई में डाल दिया। सीएम के सामने चुनौतियां और परेशानियां वैसे ही कम नहीं हैं। उनके नेतृत्व में तेजी से विकसित हो रहे उज्जैन और प्रदेश को सत्ता और संगठन के उनके ही कई साथी पचा नहीं पा रहे हैं। वे अक्सर मोर्चा खोले पड़े रहते हैं। ऐसे हालत में सेकेंड लाइन के कारण उज्जैन से उठते मुद्दे और परिस्थिति उन्हें असहज करते हैं। हालांकि इस पूरे मसले को सीएम डॉ. मोहन यादव ने जिस सहजता से संभाला, वह उनकी लीडरशिप की विशिष्टता साबित करता है। टकराव बढ़ाने के बजाय उन्होंने संवाद का रास्ता निकाला और उज्जैन के एक मजबूत समाज को अपने परिपक्व नेतृत्व से फिर अपने साथ खड़ा कर लिया।
महापौर सिर्फ एक व्यक्ति नहीं है, वह एक संवैधानिक पद है। इस पद पर बैठा शख्स एक बड़े सामाजिक आधार वाले समाज से हो तो तब प्रोटोकॉल से जुड़ी छोटी सी चूक बड़ा बखेड़ा खड़ा कर सकती है।
ऐसे में सेकेंड लाइन को अब यह समझने की जरूरत है कि वे लीडर की ढाल बनें ना कि दीवार बनकर रायता फैलाए, जिसे समेटने में सीएम को अपनी कीमती ऊर्जा खर्च करनी पड़े। उम्मीद है सेकेंड लाइन इस घटनाक्रम से सबक लेगी और भविष्य में असहज स्थिति नहीं बनने देगी।









