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11 जून को परम एकादशी पर पढ़ें यह कथा, तभी पूर्ण होगा व्रत और मिलेगा पुण्य

परम एकादशी का व्रत 11 जून, गुरुवार को है। यह एकादशी का व्रत हर 3 साल में एक बार आता है क्योंकि यह अधिकमास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ता है। इस बार परम एकादशी को पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बना हुआ है। जो व्यक्ति परम एकादशी का व्रत रखकर विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसे दुख और दरिद्रता से मुक्ति मिल जाती है। धन, धान्य, यश और कीर्ति में वृद्धि होती है। इस व्रत की पूजा परम एकादशी व्रत कथा सुनने के बिना पूरी नहीं होती है। जब आप व्रत कथा सुनते हैं या पढ़ते हैं तो व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

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परम एकादशी व्रत कथा

एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से अधिकमास के कृष्ण पक्ष के एकादशी व्रत और उसके महत्व के बारे में बताने का आग्रह किया। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि इसे परम एकादशी या पुरुषोत्तमी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से पाप, रोग, दोष और कष्टों से मुक्ति मिलती है। व्यक्ति के धन और वैभव में वृद्धि होती है तथा जीवन के अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। परम एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है।

काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह अपनी पत्नी के साथ धर्म-कर्म में लगा रहता था। सुमेधा की पत्नी नियमपूर्वक व्रत, पूजा और पाठ करती थी तथा घर पर आने वाले सभी अतिथियों का आदर-सत्कार करती थी। वह स्वयं भूखी रहती थी, लेकिन अतिथियों को अवश्य भोजन कराती थी। इसके बावजूद सुमेधा और उसकी पत्नी का जीवन गरीबी में व्यतीत हो रहा था।

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एक दिन सुमेधा ने अपनी पत्नी से कहा कि उसे धन कमाने के लिए परदेस जाना होगा। यहां जो धन कमाते हैं, उससे परिवार का पालन-पोषण नहीं हो पा रहा है। इस पर उसकी पत्नी ने कहा कि मनुष्य को अपने भाग्य और पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। यदि भगवान ने हमें निर्धनता दी है, तो यहीं रहकर कर्म करना चाहिए, जो भगवान चाहेंगे वही होगा।

पत्नी की इन बातों को सुनकर सुमेधा परदेस नहीं गया और वहीं रहकर कार्य करने लगा। एक दिन उसके घर पर कौण्डिन्य ऋषि पधारे। तब सुमेधा और उसकी पत्नी ने उनकी सेवा की, जिससे कौण्डिन्य ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुए। तब उस दंपति ने अपनी गरीबी दूर करने का उपाय पूछा।

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तब कौण्डिन्य ऋषि ने कहा कि तुम दोनों अधिकमास की परम एकादशी का व्रत विधि-विधान से करो। उन्होंने परम एकादशी व्रत और पूजा की विधि बताई। साथ ही कहा कि जो व्यक्ति परम एकादशी का व्रत करता है, उसकी गरीबी, दरिद्रता और पाप दूर हो जाते हैं।

जब अधिकमास की परम एकादशी आई तो दोनों ने कौण्डिन्य ऋषि के बताए अनुसार व्रत रखा और भगवान विष्णु की पूजा की। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया तथा दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट किया। फिर पारण करके व्रत को पूर्ण किया।

इस व्रत के प्रभाव से सुमेधा और उसके परिवार की गरीबी समाप्त हो गई। उनका जीवन सुख, धन और वैभव से भर गया। सुमेधा और उसकी पत्नी ने लंबे समय तक सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। अंत में भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हु

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