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शामिल हुए करीबी MLC,उद्धव खेमे में नहीं रुक रहा पलायन

महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। जून 2026 के आखिरी हफ्ते में उद्धव खेमे को एक के बाद एक दो बड़े झटके लगे हैं। पहले लोकसभा में पार्टी के दो-तिहाई सांसदों ने बगावत की और अब मंगलवार (30 जून 2026) को पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधान परिषद सदस्य (MLC) सचिन अहीर ने भी उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया।

 

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1. विधान परिषद में झटका: महायुति के उम्मीदवार बने सचिन अहीर

आदित्य ठाकरे के बेहद करीबी माने जाने वाले सचिन अहीर ने पाला बदलते ही एक बड़ा सियासी कदम उठाया। उन्होंने महाराष्ट्र विधान परिषद के उपसभापति (डिप्टी चेयरमैन) पद के लिए सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन दाखिल कर दिया है।

अहीर ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार की मौजूदगी में अपना पर्चा भरा। इसे शिंदे गुट के ‘ऑपरेशन टाइगर’ की एक और बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

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2. लोकसभा में बड़ी टूट: 6 सांसदों ने बदला पाला

विधान परिषद से पहले लोकसभा में भी उद्धव ठाकरे को सबसे गहरा घाव लगा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) ने महाराष्ट्र में 9 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन हाल ही में इनमें से 6 लोकसभा सांसदों ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना का रुख कर लिया।

शिंदे गुट में शामिल होने वाले इन 6 सांसदों के नाम इस प्रकार हैं:

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  1. संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर-पूर्व)
  2. संजय हरिभाऊ जाधव (परभणी)
  3. संजय उत्तमराव देशमुख (यवतमाल-वाशिम)
  4. भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे (शिरडी)
  5. नागेश बापूराव पाटिल आष्टीकर (हिंगोली)
  6. ओमप्रकाश भूपालसिंह निम्बालकर / ओमराजे निम्बालकर (धाराशिव)

संसद (लोकसभा) में अब दोनों गुटों की स्थिति:

  • शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट): बागी सांसदों के आने के बाद संख्या बढ़कर 13 हो गई है।
  • शिवसेना यूबीटी (उद्धव ठाकरे गुट): 9 में से 6 सांसदों के जाने के बाद अब सिर्फ 3 सांसद ही बचे हैं।

दल-बदल कानून के तहत क्यों सुरक्षित हैं ये सांसद?

उद्धव ठाकरे ने इन बागी सांसदों को अयोग्य (Disqualify) घोषित करने की मांग की है, लेकिन कानूनन इन सांसदों पर कार्रवाई होना मुश्किल है। इसके पीछे आंकड़ों का गणित काम कर रहा है:

दो-तिहाई (2/3) का नियम: दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत, यदि किसी दल के कुल निर्वाचित सदस्यों में से दो-तिहाई या उससे अधिक सदस्य एक साथ टूटकर किसी दूसरे दल में शामिल होते हैं, तो उनकी सदन की सदस्यता रद्द नहीं होती। उद्धव गुट के 9 में से 6 सांसदों का अलग होना ठीक दो-तिहाई का आंकड़ा है, इसलिए तकनीकी रूप से उनकी सदस्यता सुरक्षित है।

2022 से चल रही है ‘असली’ शिवसेना की जंग

शिवसेना में इस ऐतिहासिक कलह की शुरुआत जून 2022 में हुई थी, जब एकनाथ शिंदे ने तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी थी, जिससे महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार गिर गई थी।

इसके बाद फरवरी 2023 में चुनाव आयोग (Election Commission) ने विधायी बहुमत के आधार पर एकनाथ शिंदे के गुट को ही ‘असली शिवसेना’ माना और पार्टी का आधिकारिक चुनाव चिह्न ‘तीर-कमान’ उन्हें सौंप दिया। तब से लेकर आज तक, दोनों गुटों के बीच बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक और वैचारिक विरासत पर दावा जताने की होड़ जारी है, जो 2026 में भी बदस्तूर जारी है।

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