नए घर में आते हैं डरावने सपने? जानिए वजह और उपाय

वास्तु डेस्क। कई बार लोग शिकायत करते हैं कि नए मकान में रहने के बाद से ही उन्हें अजीब-अजीब प्रकार के डरावने सपने आने लगे हैं और घर की सुख-शांति गायब हो गई है। प्राचीन वास्तु ग्रंथों के अनुसार, इसका एक बड़ा कारण उस भूखण्ड (प्लॉट) के नीचे दबे हुए शल्य यानी हड्डी, कोयला, भस्म (राख) या अन्य अवांछित पदार्थ हो सकते हैं। भूमि के भीतर छुपे इन दोषों को दूर करने और सुख-समृद्धि की बहाली के लिए वास्तु शास्त्र में ‘शल्योद्धार’ (भूमि का शुद्धिकरण) कराना बेहद अनिवार्य माना गया है।

कैसे की जाती है शल्य की पहचान? (प्राचीन विधि)
वास्तु ग्रंथों में गृह निर्माण से पहले चयनित भूमि के भीतर छुपे शल्य का पता लगाने की एक विशेष और वैज्ञानिक प्रक्रिया बताई गई है:
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नौ खण्डों का विभाजन: सबसे पहले चयनित भूमि को 9 बराबर भागों (कोष्ठकों) में विभाजित किया जाता है। पहचान के लिए इन नौ खण्डों में क्रमशः ‘व, क, च, त, ए, ह, स, य, प’ अक्षर लिखे जाते हैं।
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अक्षरों और नाम का संयोग: शल्य का सटीक स्थान जानने के लिए व्यक्ति को उसकी वर्ण व्यवस्था या प्रकृति के अनुसार विशेष श्रेणी के नाम (पुष्प, नदी, देवता या फल) का उच्चारण करने को कहा जाता है।
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नाम चयन का नियम: परंपरा के अनुसार ब्राह्मण पुष्पों का, क्षत्रिय नदियों का, वैश्य देवताओं का और अन्य लोग फलों का नाम उच्चारित करते हैं। व्यक्ति द्वारा बोले गए नाम का पहला अक्षर जिस कोष्ठक के अक्षर से मेल खाता है, शल्य उसी दिशा या खंड में होने का संकेत मिलता है। इसके अतिरिक्त ‘अहिबल चक्र’ और जन्म कुंडली/प्रश्न कुंडली में ग्रहों की तात्कालिक स्थिति के आधार पर भी गुप्त शल्य का पता लगाया जाता है।
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दिशाओं के अनुसार शल्य और उनके गंभीर परिणाम
वास्तु शास्त्र के अनुसार, भूमि के अलग-अलग कोनों में दबे शल्य का घर के सदस्यों पर भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है:
| दिशा/कोण | दबे होने वाला शल्य (पदार्थ) | गृहस्वामी और परिवार पर प्रभाव |
| पूर्व दिशा | मनुष्य की हड्डी | मृत्युतुल्य कष्ट और गंभीर बीमारियां |
| अग्निकोण (South-East) | वैशाखनन्दन (गधा/अवांछित तत्व) | राजभय, कानूनी अड़चनें या सरकारी परेशानी |
| दक्षिण दिशा | वानर (बंदर) की अस्थियां | गृहस्वामी के लिए अत्यंत घातक (मृत्यु का संकेत) |
| नैऋत्य कोण (South-West) | घोड़े का शल्य | भारी धनहानि, मानसिक क्लेश और पारिवारिक विवाद |
| पश्चिम दिशा | शिशु का शल्य | चोरी का भय, मानसिक डर और वित्तहीनता (कंगाल होना) |
| वायव्य कोण (North-West) | पुरुष का शल्य | घर के सदस्यों को अजीब और डरावने दुःस्वप्न आना |
| उत्तर दिशा | अवांछित शल्य | अत्यधिक दरिद्रता और जीवन में मृत्युतुल्य संकट |
| ईशान कोण (North-East) | भालू का शल्य | पालतू पशुओं का नाश और स्वास्थ्य खराब होना |
| मध्य भाग (ब्रह्मस्थान) | नरकपाल (खोपड़ी) या भस्म | पूरे कुल/वंश के नाश का गंभीर संकेत |
शल्योद्धार की विधि और महामंत्र
यदि भूमि में शल्य होने की पुष्टि हो जाती है, तो निर्माण कार्य शुरू करने से पहले उसका शुद्धिकरण (शल्योद्धार) आवश्यक है। ग्रंथों के अनुसार, शल्य निकालते समय यदि भूस्वामी (जमीन का मालिक) संयोगवश वहां उपस्थित न हो, तो इसे शुभ माना जाता है।
इस दोष के निवारण के लिए निम्नलिखित विशेष मंत्र का विधान है:
भूमि शुद्धिकरण महामंत्र: ‘ओम् धरणी विदारणा भूत्यै स्वाहा’
निवारण की प्रक्रिया: वास्तुशास्त्रियों के अनुसार, इस मंत्र का पांच योग्य ब्राह्मणों द्वारा कम से कम 15,000 बार जप करवाया जाना चाहिए। जप के पश्चात अक्षत (चावल) रखकर भूमि का स्पर्श करते हुए शुद्धिकरण का विचार करना चाहिए।
निर्माण के बाद निवारण है बेहद कठिन
वास्तु आचार्यों का मत है कि यदि गृह निर्माण से पहले ही ‘शल्योद्धार’ कर लिया जाए, तो भूमि संबंधी सभी प्रकार के दोष हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, यदि बिना शुद्धिकरण के ही भवन का निर्माण कर दिया जाए, तो मकान बन जाने के बाद इस दोष को दूर करना बेहद कठिन और कई बार असंभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में उस घर में निवास करने वाले लोगों को ताउम्र विभिन्न प्रकार के शारीरिक, आर्थिक कष्ट और मानसिक अशांति झेलनी पड़ती है।









