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बच्चों की मेंटल हेल्थ बिगाड़ती ये छोटी सी गलतियां,रखें ध्यान

आज के दौर में हर माता-पिता अपने बच्चे को जीवन में सबसे आगे और बेहतर देखना चाहते हैं। हालांकि, समस्या तब गंभीर रूप से शुरू होती है जब माता-पिता अपनी इन ऊंची उम्मीदों को बच्चों पर थोपने लगते हैं और उन्हें हर क्षेत्र में ‘परफेक्ट’ बनने के लिए मजबूर करते हैं। चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक भाषा में इस व्यवहार को ‘पुशी पेरेंटिंग’ (Pushy Parenting) कहा जाता है। यह तरीका बाहर से देखने में भले ही एक कड़ा अनुशासन और सफलता का रास्ता लगे, लेकिन अंदर ही अंदर यह बच्चे के मानसिक विकास के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रहा है।

 

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क्या है ‘पुशी पेरेंटिंग’ और इसके बच्चों पर प्रभाव?

मनोविज्ञान के अनुसार, जब माता-पिता बच्चों की खुद की क्षमता और इच्छाओं को दरकिनार कर उन पर अपनी अधूरी आकांक्षाएं थोपते हैं, तो वह पुशी पेरेंटिंग कहलाती है। इसके मुख्य असर और संकेतों को नीचे दी गई तालिका में विस्तार से समझा गया है:

मुख्य पहलू बच्चों के मानसिक और व्यावहारिक स्तर पर प्रभाव
मनोवैज्ञानिक परिभाषा बच्चे को हमेशा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए मजबूर करना। ऐसे में बच्चा बाहर से तो अच्छा प्रदर्शन करता दिखता है, लेकिन आंतरिक रूप से वह लगातार भारी तनाव और दबाव से जूझता है।
सोच में बदलाव बच्चे के जीवन से खेलकूद, नई चीजें सीखने की सहज ललक और बचपन की स्वाभाविक खुशियाँ गायब होने लगती हैं। उसका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ ‘परफॉर्मेंस’ और नतीजों पर टिक जाता है।
असुरक्षा की भावना बच्चा खुद को केवल तभी स्वीकार कर पाता है या खुद को योग्य समझता है, जब वह दूसरों (विशेषकर माता-पिता) की उम्मीदों की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है।

पुशी पेरेंटिंग के प्रमुख लक्षण और उनके गंभीर परिणाम

1. हर हाल में ‘नंबर वन’ आने का दबाव

इस तरह की पेरेंटिंग में माता-पिता हमेशा बच्चे से परीक्षाओं में सबसे ज्यादा अंक लाने या हर प्रतियोगिता में पहले स्थान पर आने की उम्मीद पाल लेते हैं। यदि बच्चा बहुत अच्छे नंबर लाने के बाद भी क्लास या स्कूल में टॉप नहीं कर पाता, तो उसकी सराहना करने के बजाय उसे डांट और फटकार मिलती है। इसका परिणाम यह होता है कि:

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  • बच्चे को धीरे-धीरे यह लगने लगता है कि उसकी कड़ी मेहनत और प्रयासों की कोई अहमियत नहीं है।
  • उसके मन में असफल होने का एक गहरा और परमानेंट डर बैठ जाता है, जो उसके आत्मविश्वास को पूरी तरह तोड़ देता है।

2. बच्चे की व्यक्तिगत पसंद और रुचियों को नजरअंदाज करना

पुशी पेरेंटिंग का एक बड़ा लक्षण यह है कि इसमें बच्चों की व्यक्तिगत पसंद, शौक और भावनाओं को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है। अक्सर देखा जाता है कि:

  • बच्चे की रुचि किसी विशेष खेल, संगीत, चित्रकला या रचनात्मक कलाओं में हो सकती है, लेकिन पेरेंट्स उसे अपनी मर्जी के पारंपरिक करियर या कठिन पढ़ाई की तरफ जबरन धकेलते हैं।
  • इस दबाव के कारण बच्चा अपनी वास्तविक खुशी और पैशन को अंदर ही अंदर दबाने लगता है। वह एक मशीन की तरह केवल वही काम करने की कोशिश में जुट जाता है जिससे उसके माता-पिता को सामाजिक संतुष्टि या खुशी मिल सके।

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