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दुकानों के आगे धंस रही मिट्टी, पानी से निकल रहे बच्चे सीवरेज के लिए सड़क खोदकर छोड़ी, गंदगी का लगा ढेर

अक्षरविश्व की मानसून की मुसीबत मुहिम में लोग खुलकर बता रहे अपनी समस्याएं

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उज्जैन शहर के दिख रहे दो चेहरे, एक में चमक, दूसरा बेनूर

उज्जैन। बुनियादी सुविधाओं के मामले में उज्जैन शहर के दो चेहरे दिख रहे हैं। एक चेहरा बेहद चमकदार है तो दूसरा बेनूर। एक में सुविधाओं की कोई कमी नहीं है तो दूसरे में इतनी समस्याएं हैं कि उन्हें बयान नहीं किया जा सकता। कहीं दुकानों के आगे की मिट्टी धंस रही हैं तो कहीं बच्चे पानी के बीच से गुजर रहे हैं। कहीं सीवरेज के लिए खोद दी गई सड़क महीनों से यूं ही खुली पड़ी है। कहीं नाला-नाली इस कदर अधूरे पड़े हैं कि गंदगी सड़कों पर बह रही है। दरअसल, अक्षर विश्व की मानसून की मुसीबत मुहिम में जो तस्वीर और वीडियो आ रहे हैं, वह कड़वी सच्चाई को बयान करते हैं।

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नाला खुदा, धंस रही मिट्टी, इंतजार हादसे का

जूना सोमवारिया क्षेत्र में चौड़ीकरण का काम चल रहा है। यहां सड़क और नाला बनाने के लिए खुदाई कर दी गई है। सड़क पर चलने की जगह नहीं है। नाले की गंदगी सड़क पर फैल रही है। खुदाई के कारण कटाव का डर पैदा हो गया है। रहवासी सैयद मजहरअली बताते हैं कि दुकानों तक जाना मुश्किल है, क्योंकि सीढिय़ा ही नहीं बचीं। मिट्टी का कटाव अलग से हो रहा है। मानसून के सीजन में भरे पानी में गिरने से हादसे की आशंका बनी हुई है।

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सड़क पानी में डूबी, इसमें से निकलना मजबूरी

वार्ड 40 के पंवासा में बनी नगर निगम की मल्टी के पास हालत खराब है। बारिश के इस मौसम में मल्टी तक जाने वाली रोड डूबी हुई है। पानी के बीच से ही लोग निकलने को मजबूर हैं। रहवासी शबनम कहती हैं कि बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बच्चे पानी के बीच से होकर स्कूल जा रहे हैं। जीवन नरक सा हो गया है।

चैंबर सफाई के लिए गड्ढा खोदा, खुला छोड़ा

वार्ड नंबर 4 के तिरुपति धाम एक्सटेंशन में अलग समस्या है। यहां चैंबर साफ करने के लिए दस दिन पहले गड्ढा खोद तो दिया गया लेकिन सफाई के बाद उसे यूं ही छोड़ दिया गया। रहवासी आशीष सिंह चौहान कहते हैं कि दस फीट गहरे गड्ढे को लेकर हादसे की आशंका बनी हुई है।

सीवरेज प्रोजेक्ट ने गायब की सड़क, कीचड़ से निकलने पर मजबूर

वार्ड 40 के पंवासा में सीवरेज प्रोजेक्ट ने सड़क की हालत खराब कर दी है। 20 दिन पहले सीवरेज प्रोजेक्ट के लिए सड़क की खुदाई की गई थी, अब पूरी सड़क ही गायब हो गई है। रहवासी सूरज मीणा बताते हैं कि सड़क में इतने गड्ढे हैं कि कीचड़ की वजह से चलना मुश्किल हो गया है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और लोग निकल नहीं पा रहे हैं।

जहां से शिकायत आती है, तुरंत दूर करते हैं
शहर में रोज कचरा उठ रहा है। फिर भी जहां से शिकायत आती है, वहां से तुरंत कचरा उठवाते हैं। मानसूनी मौसम में सीवरेज पाइपलाइन खुदाई का काम धीमा किया है। खुदी जगह की मरम्मत का काम तेजी से करवा रहे हैं। रोजाना डेढ़ किलोमीटर रीस्टोरेशन का काम हो रहा है। कीचड़ की समस्या से निपटने के लिए चूरी-मुरम डलवा रहे हैं। स्ट्रीट लाइट्स भी लगातार ठीक करवाई जा रही है। कोशिश यही रहती है कि समस्या तत्काल हल हो जाए।
पवनकुमार सिंह, अपर आयुक्त, नगरनिगम

अपने वार्ड की समस्या हमें भेजें
अगर आप भी अपने वार्ड में सड़क, गंदगी, कीचड़, पानी, बिजली की समस्या का सामना कर रहे हैं तो अपनी समस्या हमें भेजिए। इसे हम जिम्मेदारों तक पहुंचाएंगे। सूचना हमें मोबाइल नंबर 9826311828 पर दे सकते हैं।

विकास की रोशनी हर गली में क्यों नहीं पहुंचती?

उज्जैन आज उज्जैन अजीब विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। सिंहस्थ के लिए एक तरफ शहर में सड़कें चौड़ी हो रही हैं, चौराहे सज-धज रहे हैं, पुल-ओवरब्रिज, एलिवेटेड रोड बन रहे हैं तो दूसरी ओर एक ऐसा उज्जैन भी है, जहां टूटी सड़कें हैं, पानी से लबालब गलियां हैं, अधूरे नाले हैं, खुले गड्ढे हैं, महीनों से बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटें हैं। ऐसा लगता है मानो शहर दो हिस्सों में बंट गया है। एक सुविधाओं वाला चमकदार उज्जैन और दूसरा असुविधाओं के भरोसे पर जीता उज्जैन।

दरअसल, अक्षरविश्व की मानसून की मुसीबत मुहिम उज्जैन के दो चेहरों को बगैर किसी लाग-लपेट के सामने ला रही है। शहर के अलग-अलग वार्ड, मोहल्लों से नागरिकों द्वारा भेजी जा रही तस्वीर और वीडियो इसकी कहानी कह रहे हैं। कहीं लोग पानी के बीच से गुजर रहे हैं, कहीं गड्ढों और गंदगी से जूझ रहे हैं। कहीं सीवरेज प्रोजेक्ट ने पूरी सड़क छलनी-छलनी कर दी है तो कहीं सड़क ही गायब हो गई है। यह तस्वीरें और वीडियो विरोधी दल के आरोप नहीं उज्जैन के नागरिकों की भेजी गई कड़वी सच्चाई है।

सीएम डॉ. मोहन यादव के मंशा पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है, वे महाकाल की नगरी को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ शहर बनाने के लिए खुले हाथों से धन दे रहे हैं। बड़े-बड़े प्रोजेक्ट ला रहे हैं। उज्जैन को आगे बढ़ाने के लिए अपनी ही पार्टी के लोगों का विरोध भी झेल रहे हैं।

लेकिन मशीनरी की जवाबदेही कई जगहों पर कमजोर पड़ती दिखती है। विकास का अर्थ केवल वीआईपी इलाकों का विकास नहीं है, बल्कि उन बस्तियों की मुस्कान भी है, जहां आम आदमी रहता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि सिंहस्थ की युद्ध स्तर पर चल रही तैयारियों के बीच शहर का यह दूसरा चेहरा उपेक्षा का भाव प्रकट कर रहा है। यहां अधूरे नाले गंदगी को सड़कों पर ला रहे हैं तो सीवरेज के लिए खोदी सड़कें यूं ही पड़ी हैं और अंधेरी गलियां सुरक्षा पर सवाल उठा रही हैं।

यह स्थिति किसी भी विकसित शहर के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। इतिहास इससे प्रभावित नहीं होगा कि कितने चौराहे चमके, बल्कि वह इससे होगा कि कितनी तकलीफ दूर हुई। सीएम ने उज्जैन को नई ऊंचाई देने का सपना देखा है, हम सबको यह सुनिश्चित करना होगा कि इन सपनों पर धूल नहीं जमे, क्योकि विकास तब तक अधूरा है, जब तक कोई नागरिक यह कहने को मजबूर हो कि उज्जैन में दो शहर बसते हैं, एक सुविधाओं वाला, दूसरा संघर्षों वाला। सिंहस्थ से पहले इस दूरी को मिटाना ही हम सबकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

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