सिद्धि योग में शिप्रा के आंचल में लगाई डुबकी

घाटों पर तैनात रहे पुलिसकर्मी, होमगार्ड और एसडीईआरएफ जवान

अक्षरविश्व न्यूज|उज्जैन। माघ मास की अमावस्या यानी मौनी अमावस्या बुधवार को शिव वास और सिद्धि योग में मनाई जा रही है। अलसुबह से पहुंचे श्रद्धालुओं ने मां शिप्रा में आस्था की डुबकी लगाई और मंदिरों में दर्शन किए। इसके बाद दान कर पुण्य अर्जित किया। महिलाओं ने दीपदान भी किया।
हालांकि, इस बार रामघाट, दत्तअखाड़ा सहित अन्य घाटों पर श्रद्धालुओं की संख्या काफी कम रही। श्रद्धालु आराम से स्नान करते रहे। घाटों पर पुलिसकर्मी, होमगार्ड और एसडीईआरएफ के जवान तैनात रहे जो श्रद्धालुओं को गहरे पानी में जाने से रोकते रहे। मकर संक्रांति के उत्तरायण के बाद यह पहली अमावस्या है इसलिए इसी दिन पितृकर्म का भी विधान है। जिसके चलते श्रद्धालुओं ने पितरों के निमित्त श्राद्ध किया।
ज्योतिषाचार्य पं. अजय कृष्ण शंकर व्यास ने बताया मौनी अमावस्या पर दो विशेष योग बने। पहला शिव वास योग, यह भगवान शिव के साथ जुड़ा खास योग है जो भक्तों को लिए विशेष शुभ फल देता है। इसके अलावा सिद्धि योग भी बना जो बेहद शुभ है। इसके अलावा मकर राशि में सूर्य, चंद्रमा और बुध एक साथ त्रिग्रही व त्रिवेणी योग का निर्माण भी किया।
पितरों के श्राद्ध का विधान भी
ज्योतिषाचार्य पं. व्यास के अनुसार बारह पुराण के अध्याय 13 में बताया गया है कि जो मनुष्य श्राद्ध में ब्राह्मण या गरीब को भोजन करवाने में असमर्थ है, वह अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए एक मु_ी काले तिल दान करें तो उनके पितरों को तृप्ति प्राप्त होगी। अमावस्या को पितरों का श्राद्ध करने का विधान है। इसी के चलते रामघाट पर तर्पण सहित श्राद्धकर्म करने वालों की भी भीड़ रही।
मौन रह तप करने वाली अमावस्या
मौनी अमावस्या का शाब्दिक अर्थ है मौन रहकर तप करने वाली अमावस्या। इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। भगवान श्रीहरि विष्णु, मां लक्ष्मी, तुलसी और मां गंगा की पूजा करनी चाहिए। मौन व्रत भी रख सकते हैं। मान्यता है व्रत रखने से आत्मसंयम, मानसिक शांति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महाकाल में भी कम रही भक्तों की संख्या
मौनी अमावस्या होने के चलते उम्मीद थी कि महाकाल मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या काफी रहेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बुधवार को महाकाल मंदिर में भी रोज के मुताबिक श्रद्धालुओं की संख्या काफी कम रही। जो श्रद्धालु मंदिर पहुंचे उसमें से अधिकांश दूसरे शहरों से आए हुए थे। शीघ्र दर्शन करने वालों की संख्या भी कम रही। ऐसे में कार्तिकेय और गणेश मंडपम भी खाली-खाली रहे। इसके अलावा श्री हरसिद्धि शक्तिपीठ, बड़ा गणेश, गोपाल मंदिर, कालभैरव, मंगलनाथ सहित अन्य मंदिरों में भी भक्तों की संख्या कम रही।









