आयुष्मान भारत योजना में 1 अक्टूबर से नई शर्त

250 अस्पताल बाहर हुए तो मरीजों पर बढ़ेगा इलाज का बोझ
अक्षरविश्व न्यूज | भोपाल। आयुष्मान भारत योजना में 1 अक्टूबर से लागू होने वाली नई व्यवस्था का सीधा असर मरीजों और निजी अस्पतालों के नेटवर्क पर पड़ सकता है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के आयुष्मान योजना से जुड़े करीब 250 अस्पतालों के सामने योजना से बाहर होने का खतरा है। इन अस्पतालों को मेडिसिन पैकेज के लिए नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स (NABH) का फाइनल प्रमाण पत्र हासिल करना होगा।
सरकार का तर्क है कि नई शर्त से आयुष्मान योजना के तहत इलाज की गुणवत्ता बेहतर होगी। वहीं, निजी अस्पताल संचालकों का कहना है कि NABH के मानकों को पूरा करने में भारी खर्च आएगा, जबकि आयुष्मान पैकेज की दरें अस्पतालों की बढ़ती संचालन लागत के मुकाबले पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में सवाल है कि यदि बड़ी संख्या में अस्पताल योजना से बाहर हुए तो मरीजों के पास इलाज के कितने विकल्प बचेंगे।
चार शहरों में 465 निजी अस्पताल
प्रदेश में आयुष्मान योजना के तहत 816 निजी अस्पताल अनुबंधित हैं। इनमें से 465 अस्पताल यानी करीब 57 प्रतिशत भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में हैं।
चारों शहरों में आयुष्मान से जुड़े निजी अस्पतालों की संख्या इस प्रकार है:
- भोपाल: 228
- इंदौर: 90
- ग्वालियर: 79
- जबलपुर: 68
नई शर्त का सबसे ज्यादा असर इन्हीं चार शहरों के अस्पतालों पर पड़ने की संभावना है। यदि करीब 250 अस्पताल समय पर NABH की अंतिम मान्यता हासिल नहीं कर पाए और नेटवर्क से बाहर हो गए, तो इन अस्पतालों में आयुष्मान योजना के तहत मरीजों का इलाज नहीं हो सकेगा।
अस्पताल घटे तो मरीजों की बढ़ सकती है परेशानी
अस्पतालों की संख्या कम होने पर मरीजों को दूसरे सूचीबद्ध अस्पतालों का रुख करना पड़ सकता है। इसका असर खास तौर पर उन मरीजों पर पड़ सकता है, जो किसी विशेष अस्पताल या डॉक्टर से इलाज करा रहे हैं।
हालांकि, कितने अस्पताल वास्तव में नेटवर्क से बाहर होंगे और उपलब्ध अस्पतालों की क्षमता पर इसका कितना असर पड़ेगा, इसकी वास्तविक तस्वीर 1 अक्टूबर के बाद ही स्पष्ट होगी।
50 बेड के अस्पताल पर 40 लाख रुपए सालाना तक खर्च
नर्सिंग होम संचालकों का कहना है कि NABH सिर्फ प्रमाण पत्र लेने की प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए अस्पतालों को कर्मचारियों की संख्या, रिकॉर्ड, उपकरण और बेड से जुड़े कई मानकों को पूरा करना पड़ता है।
एक अस्पताल संचालक के अनुसार, करीब 50 बेड के अस्पताल में इन मानकों को पूरा करने पर लगभग 40 लाख रुपए सालाना अतिरिक्त खर्च आ सकता है। इसके अलावा NABH के लिए करीब 5 लाख रुपए शुल्क और निरीक्षण से जुड़े खर्च भी बताए गए हैं।
आयुष्मान पैकेज की दरों पर भी सवाल
अस्पताल संचालकों की आपत्ति केवल NABH की अतिरिक्त लागत को लेकर नहीं है। उनका कहना है कि कोरोना के बाद अस्पतालों की सामग्री और संचालन लागत बढ़ी है, लेकिन आयुष्मान पैकेज की दरों में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई।
डायलिसिस का उदाहरण देते हुए अस्पताल संचालकों का कहना है कि पहले एक साइकिल के लिए 2,250 रुपए मिलते थे। अब NABH अस्पताल के लिए यह राशि 1,485 रुपए, जबकि गैर-NABH अस्पताल के लिए 1,350 रुपए है।
अस्पताल संचालकों का यह भी दावा है कि आयुष्मान योजना के भुगतान में तीन से चार महीने की देरी होती है। ऐसे में NABH के मानकों को पूरा करने पर होने वाला अतिरिक्त खर्च उनके लिए चुनौती बन रहा है।
पहले 1 अप्रैल से लागू होनी थी शर्त
स्वास्थ्य विभाग ने पहले इस शर्त को 1 अप्रैल से लागू करने की तैयारी की थी। अस्पताल संचालकों ने मुख्यमंत्री से अतिरिक्त समय देने की मांग की थी, जिसके बाद उन्हें छह महीने की मोहलत मिली।
अब विभाग का कहना है कि 1 अक्टूबर के बाद समय सीमा आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। जिन अस्पतालों के पास फिलहाल केवल एंट्री लेवल NABH है, उन्हें छह महीने के भीतर फाइनल NABH हासिल करना होगा।
छोटे शहरों के अस्पतालों को फिलहाल राहत
नई अनिवार्यता फिलहाल भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे मेट्रो शहरों में लागू होगी। प्रदेश के अन्य जिलों में NABH को फिलहाल अनिवार्य नहीं किया गया है।
इसका एक कारण यह भी है कि प्रदेश के 90 ब्लॉक ऐसे हैं, जहां आयुष्मान योजना से जुड़ा एक भी निजी अस्पताल नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में अस्पतालों को कुछ शर्तों के तहत छूट देने की व्यवस्था रखी जाएगी, ताकि मरीजों के इलाज के विकल्प पूरी तरह खत्म न हों।
गुणवत्ता और लागत के बीच फंसा विवाद
पूरे मामले का केंद्र यही है कि आयुष्मान योजना में इलाज की गुणवत्ता बेहतर कैसे की जाए और अस्पतालों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी न पड़े। सरकार NABH के जरिए गुणवत्ता के मानकों को मजबूत करना चाहती है, जबकि निजी अस्पताल संचालकों का कहना है कि मौजूदा पैकेज दरों में NABH के मानकों को पूरा करना आर्थिक रूप से मुश्किल है।
अब 1 अक्टूबर के बाद स्थिति स्पष्ट होगी कि कितने अस्पताल फाइनल NABH हासिल कर पाते हैं और कितने आयुष्मान नेटवर्क से बाहर होते हैं। यही आंकड़ा तय करेगा कि इस बदलाव का वास्तविक असर अस्पतालों पर पड़ता है या आयुष्मान कार्डधारी मरीजों के इलाज के विकल्पों पर।









