पर्युषण पर्व : जैन धर्म अहिंसा और शांति का मार्ग दिखाता है – प्रणीत सागर जी

उज्जैन। आज के दौर में बढ़ते स्ट्रेस के बीच मानसिक शांति बड़ी चुनौती बन गई है। जैन दर्शन मानसिक अशांति के कारणों को समझकर उससे बचने का मार्ग दिखाता है। जैन दर्शन केवल शांति की बात नहीं करता, बल्कि इस बात पर भी जोर देता है कि हमारी वजह से किसी दूसरे के जीवन में अशांति न हो।
जब हम किसी दूसरे जीव को अशांत या तकलीफ पहुंचाते हैं तो स्वयं भी मानसिक तौर पर अशांत होते हैं। घर, ऑफिस या बिल्डिंग बनाने के लिए पेड़ काटकर उन्हें तकलीफ देते हंै। यदि हम किसी दूसरे का घर उजाड़ेंगे तो हमारे जीवन में शांति कैसे आ सकती है। मनुष्य मच्छर, मक्खी, चूहे, गाय और अन्य जीवों को भी कई तरह से परेशान करता है। चीटियां कतार में चल रही हों और उनके ऊपर पानी का पाइप चला दिया जाए तो उनके परिवार को तकलीफ पहुंचती है। दूसरों को अशांति देकर स्वयं के लिए शांति की अपेक्षा करना उचित नहीं है।
अहिंसा का संदेश देता है जैन धर्म
जैन दर्शन अहिंसा का संदेश देता है। हम हिंसा से बचें और अपने कारण दूसरों को अशांत ना होने दें तो हमारे जीवन में भी शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।
अशांति का कारण अपेक्षा
मानसिक अशांति का दूसरा कारण अपेक्षा है। कर्ण (कान) और चक्षु (आंख) जैसी इंद्रियों का अधिक प्रयोग मानसिक अशांति बढ़ाता है। युवा आज रील , शॉर्ट्स और वेब सीरीज जैसे डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं। इनकी वास्तविकता काल्पनिक होती है। इससे अपेक्षाएं बढ़ सकती हैं और हम वास्तविक जीवन की जगह काल्पनिक दुनिया में विचरने लगते हैं।
संयम रखना जरूरी
मानसिक शांति के लिए अपेक्षाओं के साथ खुद पर संयम रखना भी जरूरी है। जैन दर्शन अहिंसा और संयम के साथ व्यक्ति के आचरण में परिवर्तन का संदेश देता है। पर्युषण पर्व के दौरान हमें संयम,अहिंसा के नियमों का पालन कड़ाई से करना चाहिए।









