पितृपक्ष पूर्णिमा: गयाकोठा- सिद्धवट पर तर्पण करने वालों की भीड़

उज्जैन। पितृपक्ष शनिवार से शुरू हो गए। पूर्णिमा तिथि पर गयाकोठा और सिद्धवट पर बड़ी संख्या में लोग तर्पण करने पहुंचे। गयाकोठा पर तड़के से शुरू हुआ तर्पण का सिलसिला दोपहर तक जारी था। लंबी कतार में लगकर लोगों ने भगवान की पूजा की, दूध-जल, काला तिल चढ़ाया और अपनी गलतियों की क्षमा और पितरों से उनकी कृपा मांगी।
कल प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध
म हालय महाश्राद्ध की प्रतिपदा तिथि उन जातकों के लिए है, जिन्होंने इस दिन शरीर छोड़ा था। प्रतिपदा तिथि पर दिवंगत पितरों को परिवार के साथ धूप अर्पित करने का विधान है। उनके निमित्त भोजन भी अर्पित किया जाता है। ऋग्वेद के पितृ सूक्त के अनुसार श्राद्ध पर्व की प्रतिपदा का बड़ा महत्व है। ऐसे में पितरों का तर्पण जरूर करना चाहिए। उनके मोक्ष के लिए यह जरूरी है। इस तिथि की एक खासियत यह भी है कि इस दिन देहरी की पूजा की जाती है। इसे द्वार पूजा भी कहते है।
अर्थात् प्राणी अपने पूर्वजों से यह कहता है कि आज से पूरे सोलह श्राद्ध में आप हमारे घर में विराजित रहे। प्रतिपदा के श्राद्ध कर्म में पानी रखने वाली जगह पर घी और गुड़ की धूप देकरजल अर्पण किया जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार प्राणी मृत्यु के बाद अधोगति में भ्रमण करता है। एकम का महत्व इसलिए भी खास है कि जिन भी मनुष्य का किसी कारण वश विधिविधान से क्रियाकर्म नहीं होता, उनकी आत्मा तर्पण के लिए ब्रह्मांड में भटकती है।
एकम में उन प्राणियों का श्राद्ध कर्म करके उनके लिए तर्पण किया जाता है। एकम का एक महत्व यह भी है कि इस दिन तीन पीढिय़ों के पूर्वजों को एक साथ आमंत्रित किया जा सकता है। वेदों में पितृयज्ञ पंच महायज्ञ से ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऋग्वेद में इसका वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है- उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमा: पितर: सोम्यास:
पंडित श्याम पंचोली, सिद्धवट









