प्रतिभा और प्रखर बुद्धि देश से बाहर नहीं जाए तो ही देश की प्रगति होगी

संत प्रणीतसागरजी ने अक्षर विश्व से कहा ऊंची बिल्डिंग और चौड़ी सड़कें प्रगति का पैमाना नहीं
अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। भारत में योग्य नागरिक के काम में यदि अयोग्य नागरिक हस्तक्षेप करते रहेंगे तब तक भारत की प्रगति असंभव है। चौड़ी सड़क और ऊंची बिल्डिंग बनाने से देश की प्रगति नहीं होती। देश की प्रगति तब है जब देश की प्रतिभा और प्रखर बुद्धि (इंटेलिजेंट)बाहर न जाए। भारत के युवा भारत में पढ़ते हैं और विदेशी कंपनियों में काम करते हैं जो गलत है।
यह बात दिगंबर जैन संत मुनि प्रणीत सागर जी ने कही। वे चातुर्मास के लिए इन दिनों उज्जैन में विराते हैं। अक्षर विश्व से उन्होंने कहा भारत में शिक्षा प्राप्त करने वाला विदेश में जाकर साफ्टवेयर बनाता है और जरूरत पडऩे पर खरीदने के लिए भारत को अतिरिक्त रुपए खर्च करना पड़ते हैं। बच्चे के जन्म के बाद माता पिता उसे परिवार और रिश्तों के बारे में बताते हैं। जिससे उसकी बुद्धि कुंठित हो जाती है। वह सिर्फ परिवार के बारे में ही सोचता है। यदि देश और विश्व के बारे में बताएं कि वह १४० करोड़ परिवार का सदस्य है तभी उसमें विश्व और भारत के लिए जीने की भावना आएगी और वह देश के लिए काम करेगा।
इंदौर में रहने वाले जुड़वां दो भाईयों ने 13 साल पहले नागपुर में ली थी दीक्षा
सांसारिक जीवन के दौरान इंदौर में रहने वाले दो जुड़वां भाई चेतन और केतन ने 13 वर्ष पूर्व नागपुर में 26 अक्टूबर 2013 को दीक्षा ली थी। चेतन दीक्षा के बाद प्रणीतसागरजी महाराज के नाम से ख्यात हुए। उनके भाई केतन को दीक्षा के बाद आस्तिक्य सागरजी नाम मिला। सांसारिक जीवन के दौरान प्रणीतसागरजी महाराज ने बीकॉम, एमकॉम, एमबीए, एलएलबी की डिग्री हासिल की। उन्होंने भिलाई स्थित रेनेसा इंदिरा बिजनेस कॉलेज में तीन साल अध्यापन भी किया। उनके जुड़वां भाई केतन ने भी सांसारिक जीवन में बी फार्मा, एम फार्मा तथा एमबीए की डिग्री प्राप्त की है।
अयोग्य व्यक्ति हस्तक्षेप करे तो प्रगति असंभव: राजनैतिक परिदृश्य को लेकर पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा जितने भी योग्यता रखने वाले नागरिक हैं अयोग्य व्यक्ति उनके कार्य में हस्तक्षेप करेंगे तब तक भारत की उन्नति और प्रगति असंभव है। उन्होंने कहा कि धर्म दीर्घकालिक राजनीति है। जितने भी राजनेता हैं वे धर्म के ग्रंथों का अध्ययन किए बिना राजनीति में उतरेंगे तो राजनीति में धर्म का अस्तित्व समाप्त होता जाएगा। एक नेता का कर्तव्य होता है कि जनता ने चुनकर उसे विजेता बनाया है तो वह जनता को उसके इष्ट से संपर्क कराता रहे ना कि विरोध में जाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करे।
बंद करो ठाठ-बाट वरना चक्रतीर्थ या रामघाट
मुनि प्रणीतसागरजी ने कहा युवा अपने जीवन का लक्ष्य तय करें कि उन्हें आत्मिक उत्थान करना है या भोग विलास में लीन रहना है। आज के युवा युवती आध्यात्मिक और व्यवहारिक कर्तव्यों को भूल रहे हैं। इसका परिणाम उन्हें इस भव में नहीं तो आने वाले कई भवों में भुगतना पड़ेगा। उन्होंने कहा बंद करो ठाठ-बाट वरना चक्रतीर्थ या रामघाट।
सबका मालिक एक नहीं अपने आप में एक-एक मालिक: मुनि प्रणीतसागरजी ने कहा यदि सबका मालिक एक है तो एक व्यक्ति अमीर और दूसरा व्यक्ति गरीब क्यों है। सबका मालिक एक नहीं बल्कि सब अपने आप में एक-एक मालिक हैं। इसी को जैन धर्म में कर्म का सिद्धांत कहते हैं। प्रत्येक जीव को कर्म की स्वतंत्रता है। इसके मन में रखते हुए जीवन जीना चाहिए।
उतरो तो वैराग्य समंदर नहीं तो एक रुपए में मशीन के अंदर
मुनि प्रणीतसागरजी ने कहा लोग मंदिर जाकर आराधना करते हैं परंतु उनकी प्रवृत्ति में सरलता नहीं दिखती। यही कारण है कि युवाओं में धर्म के प्रति अब श्रद्धा नहीं रही है। देश में आध्यात्मिक और धार्मिक वृद्धि चाहते हैं तो जो आध्यात्म मार्ग पर चल रहे हैं उनमें यह झलकना चाहिए। तभी लोग धर्म और आध्यात्म क्षेत्र में उतर पाएंगे। उतरो तो वैराग्य समंदर नहीं तो एक रुपए में मशीन के अंदर।
प्रसिद्धि के लिए जैन सिद्धांतों के बाहर जाकर काम न करें
यह पूछे जाने पर कि क्या जैन संगठनों का ऐसे होटल में कार्यक्रम रखना ठीक है, जहां नॉनवेज परोसा जाता, संतश्री ने कहा हमारे जैन संगठनों को अपनी प्रसिद्धि के लिए जैन सिद्धांतों के बाहर जाकर काम नहीं करना चाहिए। प्रसिद्धि उतनी ही हो जहां आत्मसिद्धि हो। उन्होंने कहा दूसरे जीवों के प्रति अहिंसक प्रवृत्ति रखें। सबके पास पांच इंद्रियां हैं। आत्मा का सदभाव एक है। सभी जीव आपस में भाई बहन है। एक भाई अपने भाई या बहन को नहीं मार सकता है।









