विदेशी मां ने अपनाए भारतीय पेरेंटिंग के तरीके, दिखा बड़ा बदलाव

लाइफस्टाइल व पेरेंटिंग डेस्क। बच्चों की परवरिश का कोई एक तय और मुकम्मल फॉर्मूला नहीं होता। हर माता-पिता अपने निजी अनुभवों, पारिवारिक माहौल और समाज से सीखते हुए इस सफर में आगे बढ़ते हैं। कई बार परवरिश के सबसे बेहतरीन और व्यावहारिक विचार किसी किताब से नहीं, बल्कि दो अलग-अलग संस्कृतियों के मिलन से सामने आते हैं। कुछ ऐसा ही अनोखा और खूबसूरत अनुभव यूरोप में पली-बढ़ीं केन्सिया कला का रहा है।

एक भारतीय से शादी करने के बाद केन्सिया मां बनीं और भारत आ गईं। केन्सिया स्वीकार करती हैं कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पारंपरिक भारतीय तौर-तरीके एक दिन उनके परिवार की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन जाएंगे। लेकिन समय के साथ उन्होंने भारतीय माताओं की कुछ ऐसी आदतें अपनाईं, जिन्होंने बच्चों के साथ उनके जुड़ाव को एक नई मजबूती दी। हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर साझा किए गए उनके इन अनुभवों ने दुनिया भर के पेरेंट्स का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
जब देसी परंपराओं ने बदला मातृत्व का नजरिया
केन्सिया के अनुसार, जब वह शुरुआत में भारत आई थीं, तो यहां की कई पेरेंटिंग आदतें उनके लिए बिल्कुल नई और हैरान करने वाली थीं। हालांकि, जैसे-जैसे समय बीता, उन्होंने महसूस किया कि इन छोटी-छोटी रोजमर्रा की परंपराओं के पीछे गहरा भावनात्मक विज्ञान और पारिवारिक एकजुटता छिपी हुई है। उनका मानना है कि परवरिश में यह मायने नहीं रखता कि तरीका किस देश का है, बल्कि यह जरूरी है कि वह आपके बच्चे के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए कितना फायदेमंद है।
केन्सिया ने भारतीय माताओं के जिन 4 खास तरीकों को अपने जीवन में उतारा, वे इस प्रकार हैं:
1. को-स्लीपिंग (सह-नींद): बिस्तर एक, जुड़ाव अनेक
पश्चिमी या यूरोपीय देशों में आमतौर पर बच्चों को कुछ ही महीनों या साल भर का होने के बाद एक अलग कमरे में सुलाने की संस्कृति है। केन्सिया भी इसी ढर्रे को मानती थीं, लेकिन भारत आने के बाद उनकी यह सोच पूरी तरह बदल गई।
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भावनात्मक सुरक्षा: उन्होंने अपने बच्चे के साथ एक ही बिस्तर पर सोना (Co-Sleeping) शुरू किया। केन्सिया बताती हैं कि इससे न केवल रात के समय स्तनपान (Breastfeeding) कराना आसान हुआ, बल्कि बच्चे की छोटी-छोटी जरूरतों और उसकी हरकतों को तुरंत समझना बेहद सुलभ हो गया।
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गहरा रिश्ता: सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि इससे मां और शिशु के बीच एक अभेद्य भावनात्मक सुरक्षा का अहसास पैदा हुआ। (हालांकि, बाल रोग विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि सह-नींद के दौरान सुरक्षा मानकों का पूरा ध्यान रखना चाहिए ताकि नवजात के लिए सोने की जगह पूरी तरह सुरक्षित हो)।
2. तेल मालिश: सिर्फ शिशुओं की देखभाल नहीं, पूरे परिवार का संबल
भारतीय घरों में नवजात शिशुओं की नियमित तेल मालिश (Massage) की सदियों पुरानी परंपरा है, जिसने केन्सिया को शुरुआत से ही बहुत प्रभावित किया।
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दादी-नानी का अनुभव: केन्सिया का कहना है कि यह केवल बच्चे की त्वचा या हड्डियों को मजबूत करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार को एक सूत्र में पिरोने का जरिया है। मालिश के दौरान जब घर की बुजुर्ग महिलाएं जैसे दादी या नानी शामिल होती हैं, तो वह नई मां के लिए एक बहुत बड़ा संबल (Emotional Support) साबित होता है।
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यादगार पल: आज की भागदौड़ भरी और एकल परिवारों (Nuclear Families) वाली जिंदगी में यह परंपरा अपनों को करीब लाने का एक बेहतरीन बहाना बनती है।
3. सार्थक नाम: पहचान के साथ जड़ों से जुड़ने का माध्यम
भारत में बच्चों का नामकरण केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि एक बेहद पवित्र और विचारणीय प्रक्रिया है। यहां नाम रखते समय उसके अर्थ, पौराणिक संदर्भ और पारिवारिक मूल्यों का विशेष ध्यान रखा जाता है।
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संस्कृति का वाहक: केन्सिया को यह विचार बेहद तार्किक और खूबसूरत लगा। उन्होंने अपने बच्चों के लिए भारतीय नामों का चुनाव किया।
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वजह: उनका मानना है कि नाम सिर्फ एक पुकारने का शब्द नहीं होता, बल्कि वह अपने भीतर एक इतिहास, परंपरा और परिवार की विरासत समेटे होता है। एक गहरे अर्थ वाला नाम बच्चों को ताउम्र अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़े रखता है।
4. बच्चे का जन्मदिन: मां के मातृत्व का भी उत्सव
भारतीय माताओं की एक और अनोखी बात ने केन्सिया का दिल जीत लिया। उन्होंने नोटिस किया कि भारत में कई मांएं अपने बच्चों के जन्मदिन के विशेष अवसर पर साड़ी या अन्य पारंपरिक परिधान पहनकर बेहद अच्छे से तैयार होती हैं।
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मां के लिए खास दिन: केन्सिया कहती हैं कि इस रिवाज से यह अहसास होता है कि बच्चे का जन्मदिन सिर्फ उस बच्चे के पैदा होने का उत्सव नहीं है, बल्कि एक महिला के ‘मां’ के रूप में पुनर्जन्म का भी उतना ही बड़ा उत्सव है।
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नया रिवाज: अब केन्सिया भी अपने बच्चों के जन्मदिन पर गर्व से साड़ी पहनती हैं। उनका मानना है कि ऐसे छोटे-छोटे रीति-रिवाज पारिवारिक खुशियों को हमेशा के लिए यादगार बना देते हैं।
खुले दिमाग से सीखना ही है बेहतरीन पेरेंटिंग
केन्सिया कला का यह अनुभव किसी एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति से श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि हर संस्कृति में कुछ न कुछ ऐसा बेहतरीन छुपा होता है, जिसे अपनाकर हम अपनी परवरिश को और अधिक समृद्ध बना सकते हैं। बच्चों के साथ बिताई गई रातें, एक अर्थपूर्ण नाम, अपनों के हाथों से हुई मालिश या किसी उत्सव पर पारंपरिक लिबास पहनना भले ही ऊपरी तौर पर बहुत छोटी बातें लगें, लेकिन यही छोटी-छोटी बातें आगे चलकर बच्चों के मानस पटल पर सबसे खूबसूरत यादों की बुनियाद बनती हैं।









