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भागीरथपुरा पानी कांड… 36 मौतों के लिए जिम्मेदार था सिस्टम, नलों में बहता रहा जहर

जस्टिस सुशील गुप्ता आयोग ने माना- टाली जा सकती थी त्रासदी… 2019 की चेतावनी दबाए बैठे रहे निगम के अफसर

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अक्षरविश्व न्यूज इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी के कहर से 36 निर्दोष लोगों की जान जाने का मामला कोई कुदरती हादसा नहीं, बल्कि नगर निगम की आपराधिक लापरवाही और सड़े-गले सिस्टम का नतीजा था। हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस सुशील गुप्ता की अध्यक्षता वाले एकल सदस्यीय जांच आयोग की करीब 600 पन्नों की रिपोर्ट ने निगम प्रशासन के खोखले दावों की बखिया उधेड़ दी है। रिपोर्ट में दो टूक दर्ज है कि जनता को जो पानी पिलाया गया, वह पीने लायक ही नहीं था। अगर समय रहते सीवरेज और पेयजल पाइपलाइनों की निगरानी की जाती, तो 36 घरों के चिराग बुझने से बच जाते। मामले में हाईकोर्ट की नई डिवीजन बेंच में सुनवाई अब 21 सितंबर को होगी।

रिपोर्ट में 8 फरवरी 2019 को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी उस अलार्मिंग रिपोर्ट का जिक्र है, जिसमें भागीरथपुरा के 60 ट्यूबवेल और हैंडपंपों के पानी को सेहत के लिए खतरनाक घोषित किया गया था। बोर्ड ने चेताया था कि बिना उचित क्लोरीनेशन इस पानी का इस्तेमाल जानलेवा हो सकता है। इसके बावजूद तत्कालीन निगमायुक्त और अपर आयुक्त फाइलों पर कुंडली मारकर बैठे रहे और कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

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इस गंभीर चेतावनी को कचरे के डिब्बे में डालकर अफसर वर्षों तक गहरी नींद में सोते रहे। न तो इलाके में पानी के शुद्धिकरण के लिए क्लोरीन प्लांट लगाए गए और न ही दूषित स्त्रोतों को सील करने की जहमत उठाई गई। नतीजा यह रहा कि जनता लगातार नलों से धीमा जहर पीती रही और अंतत: यह लापरवाही 36 जिंदगियों की मौत का सबब बन गई। आयोग ने टेंडर प्रक्रिया में हुई घातक देरी को भी कठघरे में खड़ा किया है। रिपोर्ट के अनुसार कई स्तरों पर फाइलें अकारण रोकी गईं।

जांच में तत्कालीन अपर कमिश्नर भव्या मित्तल, कार्यपालन यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव, सहायक यंत्री सरताज कुमार प्रजापति, उप यंत्री सम्यक जैन सहित टेंडर कमेटी के श्रीकांत कांटे, देवधर दरवाई और अभय राजनगांवकर की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। वहीं, तत्कालीन आयुक्त शिवम वर्मा और प्रतिभा पाल के खिलाफ ठोस चूक न मिलने पर उन्हें राहत दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक नई पाइपलाइन और मरम्मत के टेंडर को जानबूझकर लालफीताशाही की भेंट चढ़ा दिया गया, जिससे समय रहते काम शुरू नहीं हो सका।

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पाइपलाइन डिजाइन में बरती गई थी तकनीकी लापरवाही
आयोग ने सीवर और पेयजल नेटवर्क के रख-रखाव में मानकों की घोर अनदेखी उजागर की। दोनों लाइनों के बीच सुरक्षित दूरी न होना, सीवर लाइन का पानी की लाइन से ऊपर होना, अवैध कनेक्शन और लीकेज की सुध न लेना इस भीषण त्रासदी का मुख्य कारण बना। आयोग ने सिफारिश की है कि सुरक्षित पानी देना प्रशासन का पहला फर्ज है और ऐसे संवेदनशील मामलों में शिकायतों पर तुरंत एक्शन होना चाहिए।

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