चट्टानों में इतिहास, 300 फीट ऊंची टेकरी पर सदियों की आस्था में शक्ति

चामुंडा और तुलजा भवानी के प्राचीन मंदिरों से जुड़ी हैं राजपरंपराएं और लोकमान्यताएं
सदियों से देवास की पहचान बनी माता टेकरी, नवरात्रि में देशभर से पहुंचते हैं श्रद्धालु
अमित व्यास देवास। शहर के बीचों-बीच करीब 300 फीट ऊंची माता टेकरी दूर से सामान्य पहाड़ी नजर आती है, लेकिन इसकी चढ़ाई शुरू होते ही देवास के इतिहास की परतें खुलने लगती हैं। कहीं चट्टान में उकेरी गई देवी की प्रतिमा, कहीं सदियों पुरानी पूजा परंपरा, तो कहीं राजघरानों से जुड़ी मान्यताएं। मां चामुंडा और मां तुलजा भवानी के मंदिरों वाली यह टेकरी आज देवास की धार्मिक पहचान ही नहीं, बल्कि शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मृति का भी सबसे बड़ा प्रतीक है। जिला प्रशासन भी इसे देवास का प्रमुख आकर्षण और सदियों से आबाद स्थल बताता है।
देवास के नाम की उत्पत्ति को लेकर प्रमुख मान्यता माता टेकरी से जुड़ी है। टेकरी को देवी वासिनी अथवा देवी वाशिनी की पहाड़ी के रूप में भी संदर्भित किया जाता है। ‘देव’ और ‘वास’ यानी देवताओं का निवास इस अर्थ से देवास नाम की व्याख्या की जाती है। यह मान्यता शहर और टेकरी के रिश्ते को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि नाम और पहचान के स्तर पर भी जोड़ती है।
टेकरी की सबसे खास विशेषताओं में मां चामुंडा और मां तुलजा भवानी की शैलोत्कीर्ण प्रतिमाएं हैं। मध्यप्रदेश की प्रस्तावित देवास विकास योजना में दोनों मंदिरों की प्रतिमाओं को शैलोत्कीर्ण बताया है। इसी दस्तावेज में इन्हें राष्ट्रकूटकालीन प्रतिमाओं से जोड़े जाने का उल्लेख भी है। हालांकि प्रतिमाओं की सटीक काल-निर्धारण को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं, इसलिए इनके बारे में निश्चित अवधि बताने के बजाय उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर ही बात करना उचित है।
चामुंडा माता टेकरी के पंडित मुकेश नाथ पुजारी ने बताया कि टेकरी पर चामुंडा मंदिर परिसर से जुड़े पुराने निर्माणों के भी संदर्भ मिलते हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री में वर्ष 1876 में दीप स्तंभ, ओटले और कुंड के निर्माण का उल्लेख मिलता है। यानी 19वीं सदी में भी यह स्थान व्यवस्थित धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था। मां तुलजा भवानी को बड़ी माता और मां चामुंडा को छोटी माता कहा जाता है। दोनों को बहनों के रूप में मानने की लोकपरंपरा यहां बेहद प्रचलित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद हुआ और दोनों अपना स्थान छोड़कर जाने लगीं। मान्यता है कि बड़ी माता तुलजा भवानी का आधा स्वरूप धरती में समा गया, जबकि मां चामुंडा टेकरी पर ही विराजित रहीं। यही कारण है कि दोनों के स्वरूप, स्थान और दिशाओं को भी इस कथा से जोड़ा जाता है।
‘रक्तपीठ की मान्यता, लेकिन इतिहास में अलग दर्जा
पंडित जी ने बताया कि माता टेकरी को लेकर एक और प्रमुख धार्मिक मान्यता है कि यहां माता सती के रक्त की बूंदें गिरी थीं। इसी आधार पर कुछ श्रद्धालु इसे ‘रक्तपीठ’ के रूप में मानते हैं। यह कथा शक्ति उपासना की धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, लेकिन इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यही टेकरी की खासियत भी है यहां इतिहास और आस्था साथ-साथ चलते हैं, लेकिन दोनों को एक ही कसौटी पर नहीं रखा जा सकता।
राजघरानों की कुलदेवी से शहर की आराध्य तक
माता टेकरी का संबंध देवास की रियासत और राजपरिवारों की परंपराओं से भी रहा है। मां चामुंडा को पवार राजघराने की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता रहा है। वहीं मां तुलजा भवानी की उपासना मराठा परंपरा और होलकर राजवंश से जोड़कर देखी जाती है। टेकरी पर केवल दो प्रमुख मंदिर ही नहीं हैं। भैरव बाबा, हनुमानजी, कालिका माता, अष्टभुजा माता और अन्नपूर्णा माता सहित कई धार्मिक स्थल यहां की आस्था को विस्तार देते हैं। इसलिए टेकरी पर पहुंचने वाला श्रद्धालु केवल एक मंदिर के दर्शन नहीं करता, बल्कि पूरे धार्मिक परिसर की परिक्रमा करता है।
उज्जैन तक सुरंग की कहानी कितनी सच?
टेकरी से उज्जैन की भर्तृहरि गुफाओं तक कथित प्राचीन सुरंग होने की कहानी भी वर्षों से सुनाई जाती है। लोककथाओं में इसकी लंबाई करीब 45 किलोमीटर बताई जाती है और इसे प्राचीन समय में गुप्त आवागमन से जोड़ा जाता है। लेकिन इस सुरंग की इतनी लंबाई, निर्माण काल या ऐतिहासिक उपयोग को प्रमाणित करने वाला ठोस दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे इतिहास के बजाय लोककथा और किंवदंती के रूप में ही देखा जाना चाहिए।









